वंदे मातरम् के 150 साल: कांग्रेस-भाजपा फिर आमने-सामने, जानें पूरा विवाद

भारत में राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस गरमा गई है। इस साल गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर, कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक कार्यक्रमों में गीत के केवल शुरुआती दो पद ही गाने का फैसला किया है। इस फैसले को भाजपा ने राष्ट्रगीत के “अपमान” से जोड़ते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिससे दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों के बीच विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
यह टकराव कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति के उस ऐतिहासिक फैसले तक जाती हैं, जिसमें पार्टी ने वंदे मातरम् के केवल पहले दो पदों को ही औपचारिक रूप से अपनाने का निर्णय लिया था। यह निर्णय आज़ादी की लड़ाई के दौर में लिया गया था, जब गीत के बाद के पदों में देवी दुर्गा से जुड़े संदर्भों को लेकर कुछ समुदायों में आपत्तियां उठी थीं।
विवाद की जड़ क्या है?
वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी। यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक शक्तिशाली प्रेरणास्रोत बना और देशभर में स्वतंत्रता सेनानियों को एकजुट करने में इसकी अहम भूमिका रही।
- गीत की मूल रचना में कुल छह पद (श्लोक) हैं।
- 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय आयोजनों के लिए स्वीकृत किया।
- बाद के पदों में मातृभूमि की देवी दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है, जिनकी वजह से उस दौर में कुछ आपत्तियां सामने आई थीं।
- यही निर्णय आज भी राजनीतिक बहस का केंद्र बिंदु बना हुआ है।
भाजपा नेताओं का तर्क है कि 1937 का यह निर्णय गीत के “मूल स्वरूप को खंडित” करता है, और उनका आरोप है कि इसी तरह के “विभाजनकारी दृष्टिकोण” ने आगे चलकर देश के विभाजन की ज़मीन तैयार करने में भूमिका निभाई। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि यह ऐतिहासिक तथ्यों की चयनात्मक व्याख्या है, जिसका मकसद पुराने स्वतंत्रता सेनानियों और नेताओं को बदनाम करना है।
दोनों पक्षों की दलीलें
सत्तापक्ष का पक्ष
भाजपा नेताओं का कहना है कि वंदे मातरम् “राष्ट्र की आत्मा” है और इसे इसके पूर्ण, मूल स्वरूप में सम्मान मिलना चाहिए। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर संसद में भी विस्तार से अपनी बात रखी है, और सरकार ने गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर वर्षभर चलने वाले राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों की शुरुआत भी की है।
विपक्ष का पक्ष
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि 1937 का फैसला किसी एक समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए लिया गया था, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन में सभी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। विपक्ष का यह भी आरोप है कि इस बहस को जानबूझकर ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों, जैसे मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया, से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।
संसद में भी गूंजा था मुद्दा
गौरतलब है कि इससे पहले संसद के शीतकालीन सत्र में भी वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में विशेष चर्चा आयोजित की गई थी। इस चर्चा के लिए दोनों सदनों में कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया गया था, और सत्तापक्ष व विपक्ष के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसमें हिस्सा लिया था।
चर्चा के दौरान राष्ट्रवाद, ऐतिहासिक व्याख्या और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत जैसे विषयों पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली थी।
आगे क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भी सुर्खियों में बना रह सकता है, खासकर वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में वर्षभर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के दौरान। दोनों प्रमुख दल इस मुद्दे को अपने-अपने राजनीतिक आख्यान को मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
इस बीच, आम नागरिकों और इतिहासकारों के एक वर्ग का मानना है कि राष्ट्रगीत जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक टकराव से दूर रखा जाना चाहिए, ताकि यह अपनी मूल भावना — राष्ट्रीय एकता और गौरव — को बनाए रख सके।
