
लद्दाख के जाने-माने पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार वजह उनकी भूख हड़ताल और उसके बाद अस्पताल में भर्ती किए जाने से जुड़ा घटनाक्रम है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक दोनों हलकों में हलचल मचा दी है।
भूख हड़ताल की शुरुआत कैसे हुई?
सोनम वांगचुक 28 जून 2026 से नई दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे थे। यह भूख हड़ताल उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के समर्थन में शुरू की थी — यह एक युवाओं की अगुवाई वाला आंदोलन है, जो मूल रूप से मई महीने में एक ऑनलाइन व्यंग्यात्मक अभियान के रूप में शुरू हुआ था। इस आंदोलन का नाम मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की उस टिप्पणी से जुड़ा है, जिसे देश के बेरोज़गार युवाओं के संदर्भ में विवादास्पद माना गया था।
CJP का मुख्य आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर है, जो मई महीने में हुए एक प्रवेश परीक्षा पेपर लीक मामले से जुड़ा है, जिसने लाखों छात्रों को प्रभावित किया था। वांगचुक ने इसी मांग के समर्थन में भूख हड़ताल शुरू की थी।
21 दिन बाद अस्पताल में भर्ती
लगातार 20 दिनों से ज़्यादा चली भूख हड़ताल के बाद वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगी। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर मंतर से वीएमएमसी और सफदरजंग अस्पताल ले गई और वहां भर्ती करा दिया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, उन्हें कड़ी चिकित्सीय निगरानी में रखा गया है।
19 जुलाई सुबह 8:30 बजे तक जारी हुए मेडिकल बुलेटिन के मुताबिक वांगचुक की नाड़ी (पल्स), ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन का स्तर फिलहाल सामान्य बताया गया है, हालांकि डॉक्टरों ने यह भी संकेत दिया है कि लंबे उपवास के कारण उनके कुछ ब्लड पैरामीटर्स में बदलाव देखा गया है।
पत्नी का आरोप — ‘जबरन हिरासत’
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि:
- वांगचुक को उनकी सहमति के बिना अस्पताल ले जाया गया
- अस्पताल की रिपोर्ट्स में कई असंगतियां हैं
- परिवार को उनकी पूरी मेडिकल जानकारी नहीं दी जा रही
- उन्हें अस्पताल से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी जा रही
इन आरोपों के बाद गीतांजलि ने वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से किसी अन्य, बेहतर सुविधाओं वाले अस्पताल में स्थानांतरित करने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। उन्होंने अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।
वांगचुक का पहला संदेश
अस्पताल में भर्ती होने के बाद वांगचुक ने पहली बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक संदेश जारी किया, जो उनकी पत्नी के माध्यम से साझा किया गया। उन्होंने अपनी मौजूदा स्थिति को “अवैध हिरासत” बताते हुए इसे “भारत का दूसरा आज़ादी आंदोलन” करार दिया। उन्होंने इसे अन्याय, भय, पेपर लीक और अपनी कथित गैरकानूनी हिरासत के खिलाफ लड़ाई बताया है।
अपने संदेश में उन्होंने 20 जुलाई को प्रस्तावित ‘चलो संसद’ मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की है।
दिल्ली पुलिस का पक्ष
दिल्ली पुलिस का कहना है कि जंतर मंतर, दिल्ली का एकमात्र निर्धारित विरोध-प्रदर्शन स्थल है, और वहां विभिन्न समूहों को प्रदर्शन की अनुमति दी गई है, जबकि अन्य स्थानों पर सुरक्षा कारणों से अनुमति नहीं दी गई। पुलिस प्रशासन का यह भी कहना है कि वांगचुक को उनकी बिगड़ती सेहत को देखते हुए, चिकित्सीय एहतियात के तौर पर अस्पताल ले जाया गया था।
यह मामला अब कानूनी दायरे में पहुंच चुका है, और अदालत में इस पर आगे सुनवाई होने की उम्मीद है।
सोनम वांगचुक की पृष्ठभूमि
सोनम वांगचुक की पहचान केवल इस भूख हड़ताल तक सीमित नहीं है। वे लंबे समय से लद्दाख में छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर आंदोलन चलाते रहे हैं। लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, और तब से वहां के लोग अपनी नाज़ुक पारिस्थितिकी और स्थानीय संस्कृति की सुरक्षा के लिए विशेष दर्जे की मांग कर रहे हैं।
इससे पहले भी वांगचुक कई बार भूख हड़ताल कर चुके हैं, जिनमें मार्च 2024 की 21 दिन की हड़ताल भी शामिल है, जो उन्होंने लेह में लद्दाख की राज्य दर्जे की मांग को लेकर की थी। वे बर्फ के स्तूप (आइस स्तूप) तकनीक के आविष्कार और शिक्षा सुधार के क्षेत्र में अपने काम के लिए भी जाने जाते हैं। वर्ष 2009 की बॉलीवुड फिल्म ‘3 इडियट्स’ का एक प्रमुख किरदार उनके जीवन से प्रेरित बताया जाता है।
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आगे क्या?
फिलहाल पूरे देश की निगाहें दो बातों पर टिकी हैं — पहला, वांगचुक की सेहत को लेकर अस्पताल का अगला मेडिकल बुलेटिन, और दूसरा, 20 जुलाई को होने वाला प्रस्तावित संसद मार्च, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल याचिका पर सुनवाई का नतीजा भी इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकता है।
यह स्पष्ट है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की भूख हड़ताल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने शिक्षा व्यवस्था में सुधार, विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और प्रशासनिक हस्तक्षेप की सीमाओं जैसे व्यापक सवालों को भी जन्म दे दिया है।
