Caption: 25 बार तबादला होने वाले "सिंघम" IAS अफसर तुकाराम मुंढे
कौन हैं तुकाराम मुंढे? 25 बार ट्रांसफर होने वाले “सिंघम” IAS अफसर की पूरी कहानी |
महाराष्ट्र के प्रशासनिक हल्कों में अगर किसी अफसर का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है, तो वो हैं तुकाराम मुंढे। ईमानदार छवि, सख्त फैसले और बार-बार होने वाले तबादलों के लिए मशहूर यह IAS अफसर आज महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर के तौर पर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। लोग उन्हें प्यार से “सिंघम” कहते हैं, तो कुछ नेता उनके नाम से ही घबरा जाते हैं। आखिर कौन हैं तुकाराम मुंढे और उनकी कहानी इतनी खास क्यों है? आइए जानते हैं शुरुआत से लेकर आज तक की पूरी कहानी।
1. जन्म और शुरुआती जीवन
तुकाराम मुंढे का जन्म 3 जून 1975 को महाराष्ट्र के बीड जिले के तडसोन्ना गांव में हुआ था। उनका परिवार एक साधारण किसान परिवार था और आर्थिक तंगी उनके बचपन का हिस्सा रही। स्कूल से लौटने के बाद वे अपने पिता के साथ खेतों में काम करते थे और बाजार में सब्जियां बेचने भी जाते थे। यह सिलसिला दसवीं कक्षा तक चलता रहा।
दसवीं पास करने के बाद वे पढ़ाई के लिए औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) अपने रिश्तेदार के घर चले गए। 1996 में उन्होंने ग्रेजुएशन पूरी की और इसके बाद पोस्ट-ग्रेजुएशन के लिए मुंबई आ गए। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर देश की सबसे कठिन परीक्षा तक पहुंचने का उनका सफर आज भी हजारों युवाओं को प्रेरणा देता है।
2. शिक्षा
तुकाराम मुंढे ने अपनी स्कूली शिक्षा महाराष्ट्र से ही पूरी की और इसके बाद राजनीति शास्त्र (Political Science) में मास्टर डिग्री (M.A.) हासिल की। उन्होंने UGC-JRF (Political Science) भी क्वालिफाई किया, जो उनकी अकादमिक क्षमता को दर्शाता है। मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उनकी पढ़ाई के प्रति गंभीरता और मेहनत उन्हें बाकी उम्मीदवारों से अलग करती थी।
3. UPSC की तैयारी और सफलता
UPSC की राह आसान नहीं थी। पहले प्रयास में तुकाराम मुंढे को सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार मेहनत करते हुए उन्होंने 2005 की सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 20 हासिल की। यह उपलब्धि किसी साधारण किसान परिवार के बेटे के लिए बहुत बड़ी बात थी और यहीं से उनके प्रशासनिक करियर की नींव पड़ी।
4. IAS अफसर के तौर पर करियर की शुरुआत
2005 बैच के IAS अफसर तुकाराम मुंढे को महाराष्ट्र कैडर मिला। उनकी पहली पोस्टिंग अगस्त 2005 में सोलापुर में ट्रेनी सब-कलेक्टर के तौर पर हुई। इसी पहली पोस्टिंग में उन्होंने एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति के अवैध बार को बंद करवा दिया था, जिसने आगे आने वाले उनके करियर का रुख साफ कर दिया — नियमों से समझौता नहीं, चाहे सामने कोई भी हो।
5. अब तक कितनी बार हुआ तबादला और किन-किन विभागों में किया काम
तुकाराम मुंढे की पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा उनके बार-बार होने वाले तबादले हैं। सामान्य तौर पर एक IAS अफसर को किसी पद पर 2 से 3 साल का कार्यकाल मिलता है, लेकिन मुंढे के मामले में ऐसा शायद ही कभी हुआ। अपने करीब 21 साल के करियर में उनका लगभग 25 बार तबादला हो चुका है, यानी औसतन एक साल से भी कम समय हर पोस्टिंग में।
उनके करियर के प्रमुख पड़ाव कुछ इस तरह रहे हैं:
- सोलापुर – ट्रेनी सब-कलेक्टर के तौर पर करियर की शुरुआत, बाद में नवंबर 2014 में जिलाधिकारी (District Magistrate) बने। यहां उन्होंने रेत माफिया पर सख्त कार्रवाई की, खनन राजस्व दोगुना किया और सैकड़ों गांवों को टैंकर-मुक्त बनाया। इसी प्रदर्शन के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें “बेस्ट कलेक्टर” अवॉर्ड दिया।
- देगलूर उपमंडल – डिप्टी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के तौर पर काम किया।
- नागपुर जिला परिषद – CEO के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।
- वाशिम और कल्याण – CEO के पद पर काम किया।
- जालना – जिलाधिकारी के तौर पर पोस्टिंग हुई।
- मुंबई सेल्स टैक्स विभाग – असिस्टेंट कमिश्नर के तौर पर काम किया।
- नवी मुंबई महानगरपालिका – मई 2016 में कमिश्नर बने और ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, कैशलेस पहल और ठोस कचरा प्रबंधन जैसी कई नई योजनाएं शुरू कीं।
- पुणे महानगर परिवहन महामंडल (PMPL) – मार्च 2017 में CEO बने।
- नाशिक महानगरपालिका – फरवरी 2018 में कमिश्नर बने। यहां उन्होंने अवैध निर्माण और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई की, कचरा पृथक्करण अनिवार्य किया और पार्किंग नीति लागू की। उनके तबादले के विरोध में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए थे।
- राज्य योजना विभाग – नवंबर 2018 में संयुक्त सचिव बने।
- मुंबई एड्स कंट्रोल प्रोजेक्ट – दिसंबर 2018 में प्रोजेक्ट ऑफिसर के तौर पर काम किया।
- नागपुर महानगरपालिका – जनवरी 2020 में कमिश्नर बने। यह उनका सबसे चर्चित कार्यकाल रहा, क्योंकि इसी दौरान कोविड-19 महामारी की पहली लहर आई। उन्होंने कंटेनमेंट ऑपरेशन, टेस्टिंग-कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और अस्पतालों की तैयारी को सख्ती से लागू किया, जिससे नागपुर के स्वास्थ्य आंकड़े औसत से बेहतर रहे। हालांकि उनकी सख्ती को कुछ लोगों ने “तानाशाही रवैया” भी बताया और स्थानीय नेताओं से टकराव भी हुआ।
- महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण, मुंबई – अगस्त 2020 में सदस्य सचिव बने।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) – 2022 में डायरेक्टर रहे। यहां उन्होंने उन सरकारी डॉक्टरों पर कार्रवाई की जो ड्यूटी के बजाय निजी प्रैक्टिस कर रहे थे, और महज एक हफ्ते के भीतर उनका तबादला कर दिया गया।
- इसके अलावा वे दिव्यांग कल्याण विभाग के सचिव और राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग, मुंबई में भी सचिव के तौर पर काम कर चुके हैं।
कुल मिलाकर वे अब तक 27 से ज्यादा पोस्टिंग और 15 अलग-अलग जगहों पर काम कर चुके हैं, जो उनके करियर को महाराष्ट्र के सबसे ज्यादा तबादलों वाले IAS अफसरों में शामिल करता है।
6. अब FDA में क्या काम कर रहे हैं और कौन-कौन से बड़े फैसले लिए
मई 2026 में तुकाराम मुंढे को महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) का कमिश्नर बनाया गया। पदभार संभालते ही उन्होंने खाद्य सुरक्षा को लेकर राज्यभर में एक बड़ा अभियान छेड़ दिया। उनके कुछ बड़े फैसले इस प्रकार हैं:
- दूध में मिलावट के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान – डेयरी, ट्रांसपोर्टर, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता तक सभी को सख्त नियामक जांच के दायरे में लाया गया।
- नकली दवाओं और प्रतिबंधित तंबाकू उत्पादों पर छापेमारी – कई अवैध प्रतिष्ठान सील किए गए और करोड़ों रुपये का सामान जब्त किया गया।
- मिलावटखोरों की गिरफ्तारी – दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया।
- उन्होंने साफ कहा कि “दूध सिर्फ एक खाद्य उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों, माताओं, मरीजों और बुजुर्गों की पोषण की नींव है, इसमें मिलावट बर्दाश्त नहीं होगी।“
- हाल ही में साओजी मटन को लेकर दिए गए उनके बयान पर भी विवाद हुआ, जिसे लेकर उनकी काफी आलोचना भी हुई।
इस अभियान का असर इतना बड़ा रहा कि राज्य में दूध और पनीर की सप्लाई में गिरावट देखी गई, और मामला बॉम्बे हाई कोर्ट तक भी पहुंचा।
7. लोग उन्हें इतना क्यों पसंद करते हैं और नेता क्यों डरते हैं?
तुकाराम मुंढे को आम जनता “जनता का अफसर” मानती है। इसकी वजह साफ है — वे किसी भी पद पर रहें, उन्होंने हमेशा नियमों को दलगत राजनीति और दबाव से ऊपर रखा। चाहे अवैध शराब के अड्डे बंद कराना हो, रेत माफिया पर नकेल कसना हो, अवैध निर्माण गिराना हो या मिलावटखोरों पर छापेमारी — उनके फैसले सीधे आम आदमी के फायदे से जुड़े रहे हैं। यही वजह है कि नाशिक जैसे शहरों में जब उनका तबादला हुआ, तो आम जनता सड़कों पर उतर आई थी।
वहीं दूसरी तरफ, राजनेताओं, ठेकेदारों और वाणिज्यिक लॉबी के एक वर्ग के लिए मुंढे किसी “सिरदर्द” से कम नहीं। उनके ज्यादातर तबादले प्रशासनिक प्रदर्शन की वजह से नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव और ठेकेदार नेटवर्क से टकराव की वजह से हुए बताए जाते हैं। उन्हें अक्सर हरियाणा के मशहूर IAS अफसर अशोक खेमका से भी तुलना की जाती है, जो अपने ईमानदार रवैये के लिए जाने जाते हैं।
