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मुंबई लोकल में मराठी जवाब पर तालियां: सम्मान, दबाव या भाषा की राजनीति?

मुंबई लोकल ट्रेन में मराठी बोलते हुए मुस्लिम व्यक्ति का वायरल वीडियो जिस पर यात्री तालियां बजा रहे हैं - एकता की मिसाल।"

मुंबई लोकल में 'भाषाई एकता' की खूबसूरत मिसाल! जब एक मुस्लिम शख्स ने मराठी में जवाब दिया, तो यात्रियों ने तालियां बजाकर किया स्वागत। देखिए यह वायरल वीडियो जो दिल जीत रहा है।"

मुंबई लोकल में मराठी जवाब पर तालियां: सम्मान, दबाव या भाषा की राजनीति?

मुंबई:

मुंबई लोकल ट्रेन का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है। वीडियो में एक मुस्लिम व्यक्ति मराठी भाषा में शांत और आत्मविश्वास से जवाब देता है। उसके बाद ट्रेन में मौजूद कुछ यात्री तालियां बजाते दिखाई देते हैं। देखने में यह पल भाषाई सौहार्द और आपसी सम्मान का प्रतीक लग सकता है, लेकिन इस एक दृश्य ने महाराष्ट्र में लंबे समय से चल रही भाषा की राजनीति पर नई बहस छेड़ दी है।

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यह घटना सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति के मराठी बोलने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वह माहौल भी है, जिसमें भाषा को धीरेधीरे संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और सत्ता का औज़ार बना दिया गया है। यही वजह है कि इस वीडियो को लोग अलगअलग नज़रिए से देख रहे हैं।

भाषा: संवाद का ज़रिया या पहचान की कसौटी?

भारत एक बहुभाषी देश है। यहां भाषा ने हमेशा लोगों को जोड़ने का काम किया है।

मुंबई जैसी महानगरी में मराठी के साथसाथ हिंदी, उर्दू, गुजराती, तमिल, तेलुगु और अंग्रेज़ी बोलने वाले लोग साथ रहते और काम करते हैं। यही विविधता इस शहर की असली पहचान है।

लेकिन जब भाषा को यह तय करने का पैमाना बना दिया जाए कि कौनअपनाहै और कौनबाहरी”, तब समस्या शुरू होती है।

सवाल उठता है

क्या किसी इंसान की नीयत, मेहनत या देशभक्ति सिर्फ़ इस आधार पर तय की जानी चाहिए कि वह कौनसी भाषा बोलता है?

मराठी भाषा का सम्मान जरूरी है, लेकिन सम्मान और मजबूरी के बीच की रेखा को समझना भी उतना ही ज़रूरी है।

क्या भाषा की लड़ाई वाकई ज़रूरी है?

आज जब महाराष्ट्र और देश, बेरोज़गारी, बढ़ती महंगाई ,शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल स्थिति शहरी सुविधाओं की कमी

जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब भाषा को लेकर विवाद सबसे आगे क्यों आ जाते हैं? क्या भाषा की राजनीति से लोकल ट्रेनों की भीड़ कम होती है? क्या इससे युवाओं को नौकरी मिलती है?

इन सवालों के जवाब आज भी आम आदमी के लिए अस्पष्ट हैं। भाषा पर गर्व स्वाभाविक है, लेकिन जब वही गर्व टकराव में बदल जाए, तो उसका नुकसान समाज को उठाना पड़ता है।

वोट बैंक और भावनाओं की राजनीति

राजनीति में भाषा, धर्म और पहचान सबसे आसान भावनात्मक मुद्दे होते हैं। इन पर जनता जल्दी प्रतिक्रिया देती है और असली सवाल पीछे छूट जाते हैं।

चुनाव के समय ऐसे मुद्दे अचानक ज़्यादा उभरकर सामने आते हैं।

मुंबई लोकल का यह वीडियो भी उसी राजनीतिक माहौल में देखा जा रहा है, जहां हर घटना को एक नैरेटिव में ढाल दिया जाता है।जब जनता तालियां बजाती है, तब रोज़गा महंगाई बुनियादी सुविधाएं जैसे मुद्दे चर्चा से बाहर हो जाते हैं।

भाषा के नाम पर समाज को बांटने की सियासत

कई नेता मंचों से भाषा को अस्मिता और अस्तित्व से जोड़ते हैं।

लेकिन यही नेता निजी बातचीत में कई भाषाओं का सहज इस्तेमाल करते हैं।

भाषा के नाम परहम बनाम वेकी राजनीति समाज में अविश्वास और डर पैदा करती है।

इस खेल में आम आदमी सिर्फ़ दर्शक बन जाता है, जबकि सत्ता की लड़ाई ऊपरऊपर चलती रहती है।

राज ठाकरे और मराठी अस्मिता का केंद्र में आना

महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी भाषा का मुद्दा गरम होता है, राज ठाकरे का नाम चर्चा में आ जाता है।

उन्होंने मराठी अस्मिता को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाया और इसे मराठी मानुस के अधिकारों की लड़ाई बताया।

उनके समर्थकों का मानना है कि इससे मराठी पहचान को मजबूती मिली, वहीं आलोचक इसे समाज को बांटने वाली राजनीति मानते हैं।

लेकिन असली सवाल यह है

क्या इस राजनीति से ज़मीनी स्तर पर आम मराठी नागरिक को फायदा मिला?

क्या मुंबई की बुनियादी समस्याएं सुलझीं ?

मुंबई आज भी गंभीर बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है  लोकल ट्रेनों में जानलेवा भीड़

सस्ती और सुरक्षित हाउसिंग की भारी कमी

ट्रैफिक जाम और प्रदूषण हर मानसून में जलभराव महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं

इन समस्याओं का समाधान भाषा की राजनीति से नहीं निकलता।

लेकिन जब जनता भावनात्मक मुद्दों में उलझी रहती है, तब इन सवालों पर जवाबदेही कम हो जाती है।

सोशल मीडिया, तालियां और असली मतलब

सोशल मीडिया के दौर में एक छोटा सा वीडियो भी बड़ा राजनीतिक संदेश बन जाता है।

मुंबई लोकल का यह वीडियो किसी के लिए गर्व का पल है, तो किसी के लिए दबाव की तस्वीर।

सवाल यह नहीं कि तालियां क्यों बजीं, सवाल यह है कि

तालियां किस सोच के लिए बजींसम्मान के लिए या डर के माहौल के लिए?

निष्कर्ष: भाषा जोड़ने का काम करे, तो ताकत है

भाषा हमारी पहचान है, लेकिन वही भाषा अगर समाज को बांटने लगे, तो वह समस्या बन जाती है।

मराठी भाषा का सम्मान ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़रूरी है

रोज़गार, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन।

आज ज़रूरत इस बात की है कि नागरिक भावनाओं से ऊपर उठकर सवाल पूछें, क्योंकि

लोकतंत्र तालियों से नहीं, सवालों से मजबूत होता है।

 

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