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सोनम वांगचुक: लद्दाख के लिए छठी अनुसूची से लेकर आज के अनशन तक, एक लंबी लड़ाई की कहानी

सोनम वांगचुक का नाम आज देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है, लेकिन उनकी सक्रियता कोई नई बात नहीं है। फिल्म ‘3 इडियट्स’ के किरदार से प्रेरणा देने वाले इस इंजीनियर-शिक्षाविद् ने पिछले कई वर्षों से लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया है। आज जब वे 20 दिन के अनशन के बाद अस्पताल पहुंचे हैं, तो यह मौका है उनकी इस लंबी यात्रा को समझने का।

छठी अनुसूची की मांग — शुरुआत कहां से हुई

वांगचुक ने जनवरी में भी पांच दिन का अनशन किया था, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री से लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और विरासत के संरक्षण के लिए संविधान की छठी अनुसूची का दर्जा देने का अनुरोध किया था। इसके बाद उन्होंने कई बार अलग-अलग रूपों में यह मांग दोहराई।

‘दिल्ली चलो पदयात्रा’ के तहत वांगचुक लगभग 150 लोगों के एक समूह के साथ लेह से चलकर राजघाट पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, तभी दिल्ली की सीमा पर पुलिस ने निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए उन्हें हिरासत में ले लिया, जिसके बाद उन्होंने हिरासत में ही अनिश्चितकालीन अनशन शुरू कर दिया।

लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के नेतृत्व में यह आंदोलन पिछले चार वर्षों से लगातार जारी है। इनकी प्रमुख मांगें हैं:

संघर्ष के अलग-अलग पड़ाव

वर्षों के दौरान वांगचुक का यह आंदोलन कई मोड़ों से गुज़रा है:

जलवायु और पर्यावरण एंगल

वांगचुक को मुख्य रूप से एक जलवायु कार्यकर्ता के तौर पर जाना जाता है। लद्दाख जैसे नाज़ुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में अनियंत्रित पर्यटन, निर्माण गतिविधियों और ग्लेशियर पिघलने की समस्या को लेकर वे लंबे समय से आवाज़ उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि छठी अनुसूची का दर्जा मिलने से स्थानीय समुदायों को भूमि और संसाधनों पर अधिक अधिकार मिलेंगे, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा।

उनकी प्रमुख चिंताएं:

आज की स्थिति

आज सुबह जब दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले गई, तो यह उनके वर्षों पुराने संघर्ष की एक और कड़ी बन गई। हालांकि इस बार अनशन का तात्कालिक कारण शिक्षा से जुड़ा मुद्दा था, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में लद्दाख के अधिकारों की वह लड़ाई भी है जो उन्होंने वर्षों से लड़ी है।

आगे की राह

वांगचुक का आंदोलन इस बात का प्रतीक बन चुका है कि कैसे एक व्यक्ति लगातार शांतिपूर्ण तरीकों से बड़े संवैधानिक और पर्यावरणीय मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला सकता है। लद्दाख की छठी अनुसूची की मांग अब भी अनसुलझी है, और आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।

Modern Patrakaar लद्दाख और जलवायु से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विस्तृत कवरेज जारी रखेगा, ताकि हमारे पाठक इस लंबी लड़ाई के हर पहलू से अवगत रहें।

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