
भारत और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापारिक तनाव के बीच भारतीय निर्यातकों के लिए राहत की खबर आई है। अमेरिका द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए सेक्शन 301 टैरिफ ढांचे में भारत को अपेक्षाकृत निचली शुल्क श्रेणी में रखा गया है। भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका को होने वाले भारत के कुल निर्यात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इस नए 10 प्रतिशत के अतिरिक्त शुल्क के दायरे से बाहर रखा गया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय पर आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर पिछले कई महीनों से बातचीत चल रही है, और दोनों पक्ष एक स्थिर एवं पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यापारिक संबंध की दिशा में काम करते दिख रहे हैं।
क्या है पूरा मामला
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने हाल ही में दर्जनों देशों पर नए टैरिफ लागू किए, जिनमें भारत भी शामिल है। शुरुआती प्रस्ताव में भारत पर 12.5 प्रतिशत तक शुल्क लगाए जाने की बात कही जा रही थी, लेकिन बातचीत के बाद इसे घटाकर निचली श्रेणी में डाल दिया गया।
वाणिज्य मंत्रालय के एक बयान के अनुसार:
- भारत को इस नए टैरिफ ढांचे की निचली श्रेणी में रखा गया है।
- यह USTR द्वारा प्रस्तावित शुरुआती 12.5 प्रतिशत दर से कम है।
- भारत के लगभग 45 प्रतिशत निर्यात को इस अतिरिक्त शुल्क से पूरी तरह छूट दी गई है।
पृष्ठभूमि: कैसे बदलता रहा टैरिफ परिदृश्य
पिछले कुछ महीनों में भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखे गए हैं। शुरुआत में अमेरिका ने रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क लगाया था, जिससे कुल टैरिफ दर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पारस्परिक टैरिफ को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसके बाद प्रशासन को अपनी टैरिफ नीति में बदलाव करना पड़ा।
फरवरी 2026 में हुई एक महत्वपूर्ण बातचीत के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क को हटाने का आदेश दिया, और पारस्परिक शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति बनी। अब नए सेक्शन 301 प्रावधान के तहत भारत को और राहत मिली है।
व्यापार आंकड़ों पर एक नज़र
आधिकारिक व्यापार आंकड़ों के अनुसार, बीते 12 महीनों (जुलाई तक) में अमेरिका भारत के कुल निर्यात का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करता है, जो भारत के लिए अमेरिका को एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बनाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष हाल में घटकर लगभग 33.8 अरब डॉलर रह गया है।
उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
अमेरिका में भारत के राजदूत ने हाल ही में कहा कि भारत और अमेरिका को सच्चे साझेदारों के तौर पर व्यापार में उत्पन्न होने वाले घर्षण बिंदुओं को सुलझाने की ज़रूरत है, ताकि व्यवसायों के लिए पूर्वानुमानित कराधान और नियामकीय ढांचा सुनिश्चित हो सके।
वहीं कुछ उद्योग क्षेत्रों को अभी भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, क्वार्ट्ज सतह उत्पादों के निर्यातकों पर अमेरिका ने 25 से 55 प्रतिशत तक का सुरक्षा शुल्क लगाया है, जिससे इस क्षेत्र के निर्यातकों पर दबाव बढ़ा है क्योंकि वे अमेरिकी बाज़ार पर काफी हद तक निर्भर हैं।
व्यापार विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अमेरिका के सेक्शन 301 के तहत लगाए गए नए शुल्कों को कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, जिससे अमेरिकी प्रशासन की व्यापार रणनीति के सामने एक और अड़चन खड़ी हो सकती है।
आगे की राह
भारत सरकार लगातार यह कोशिश कर रही है कि दोनों देशों के बीच एक व्यापक और स्थायी द्विपक्षीय व्यापार समझौता हो सके, जिससे इस तरह के अस्थायी टैरिफ बदलावों से बचा जा सके। पिछले कुछ महीनों में दोनों पक्षों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है, और फरवरी 2026 में एक संयुक्त बयान भी जारी किया गया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में निम्नलिखित बिंदु महत्वपूर्ण रहेंगे:
- द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर अंतिम सहमति कब तक बनती है।
- किन क्षेत्रों को टैरिफ छूट में शामिल किया जाता है।
- अमेरिका में नए टैरिफ को लेकर चल रही कानूनी चुनौतियों का क्या नतीजा निकलता है।
निष्कर्ष
भारत को सेक्शन 301 टैरिफ की निचली श्रेणी में रखा जाना निर्यातकों के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन व्यापार जगत का मानना है कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए एक ठोस और औपचारिक व्यापार समझौता ही सबसे कारगर समाधान होगा। आने वाले हफ्तों में इस दिशा में होने वाली प्रगति पर देश-विदेश दोनों जगह निगाहें टिकी रहेंगी।
