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ज्ञानेश कुमार: करियर, बड़े फैसले, विपक्ष के आरोप और हालिया विवादों का पूरा विश्लेषण

ज्ञानेश कुमार: करियर, बड़े फैसले, विपक्ष के आरोप और हालिया विवादों का पूरा विश्लेषण

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पिछले कुछ वर्षों से लगातार राष्ट्रीय चर्चाओं, राजनीतिक बहसों और प्रशासनिक गलियारों के केंद्र में रहे हैं। केरल कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी रहे ज्ञानेश कुमार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से लेकर सहकारिता मंत्रालय तक कई अत्यंत संवेदनशील पदों पर काम किया है।
हाल के वर्षों में निर्वाचन आयुक्त के पद पर उनकी नियुक्ति से लेकर चुनाव प्रबंधन और ऐतिहासिक नीतिगत फैसलों तक, उन पर विपक्ष और नागरिक संगठनों द्वारा कई आरोप लगाए गए। यह ब्लॉग उनके पिछले वर्षों के प्रमुख कार्यों, उन पर लगे गंभीर आरोपों और हालिया विवादों का निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

प्रशासनिक पृष्ठभूमि और अहम जिम्मेदारियां

ज्ञानेश कुमार भारतीय नौकरशाही के उन चुनिंदा चेहरों में गिने जाते हैं जिन्होंने केंद्र सरकार के अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालयों में सीधे शीर्ष स्तर पर फैसले लिए:
  • गृह मंत्रालय (जम्मू-कश्मीर प्रभाग): ज्ञानेश कुमार उस समय गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (जम्मू-कश्मीर संभाग) थे जब अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A को निरस्त किया था। इस पूरे पुनर्गठन और सुरक्षा रणनीतियों के प्रशासनिक क्रियान्वयन में उनकी केंद्रीय भूमिका थी।
  • सहकारिता मंत्रालय: वर्ष 2021 में जब केंद्र सरकार ने नया सहकारिता मंत्रालय गठित किया, तब ज्ञानेश कुमार को इसका सचिव नियुक्त किया गया। यहाँ उन्होंने गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के साथ सीधे काम किया और बहु-राज्य सहकारी समितियों (CRCS) व सहारा रिफंड पोर्टल से जुड़े जटिल प्रोजेक्ट्स का संचालन किया।
  • संसदीय कार्य मंत्रालय: सहकारिता से पहले वे संसदीय कार्य मंत्रालय में भी सचिव पद पर रहे।
  • चुनाव आयुक्त पद पर नियुक्ति (मार्च 2024): नए कानून (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023) के तहत गठित चयन समिति द्वारा उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया।

पिछले 5 वर्षों में लगे प्रमुख आरोप और विवाद

ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल—विशेष रूप से सहकारिता मंत्रालय और चुनाव आयोग के दौरान—विपक्ष और नागरिक संगठनों ने उन पर कई राजनीतिक व प्रशासनिक आरोप लगाए:

1. नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विवाद (मार्च 2024)

ज्ञानेश कुमार की चुनाव आयुक्त पद पर नियुक्ति सीधे विवादों के घेरे में आई:
  • विपक्ष का विरोध: प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली तीन सदस्यीय चयन समिति में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने असहमति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि बैठक से ठीक कुछ घंटे पहले उन्हें 200 से अधिक नामों की सूची दी गई, जिससे शॉर्टलिस्ट किए गए अधिकारियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन करने का पर्याप्त समय नहीं मिला।
  • चीफ जस्टिस को बाहर रखने का मुद्दा: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (जिसमें सीजेआई को चयन समिति में शामिल किया गया था) को बदलकर लाए गए नए कानून के तहत यह पहली नियुक्ति थी। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार अपनी पसंद के अधिकारियों को चुनाव आयोग में बैठा रही है।

2. सहकारिता मंत्रालय के दौरान ‘निकटता’ के आरोप

सहकारिता मंत्रालय में सचिव रहते हुए ज्ञानेश कुमार ने अमित शाह के साथ नजदीकी से काम किया। जब उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया, तो विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेताओं के साथ लंबे समय तक काम करने वाले अधिकारी निष्पक्ष संवैधानिक संस्था में पूर्ण तटस्थता कैसे बनाए रख सकते हैं। हालांकि, समर्थकों और प्रशासनिक विश्लेषकों का तर्क रहा कि आईएएस अधिकारियों की पदस्थापनाएं योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर होती हैं, न कि राजनीतिक झुकाव पर।

3. सहारा-सीआरसीएस रिफंड पोर्टल विवाद

सहकारिता सचिव के रूप में ज्ञानेश कुमार ने करोड़ों सहारा निवेशकों के फंसे पैसे वापस दिलाने के लिए सीआरसीएस सहारा रिफंड पोर्टल की शुरुआत कराई थी।
  • लगा आरोप: विपक्ष और निवेशकों के संगठनों ने आरोप लगाया कि पोर्टल पर तकनीकी खामियां थीं, बहुत कम निवेशकों को वास्तविक राहत मिली, और यह पूरी कवायद केवल चुनावी लाभ और प्रचार के लिए की गई।

4. लोकसभा चुनाव 2024 और आचार संहिता के मुद्दे

चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभालने के तुरंत बाद देश में 2024 के आम चुनाव संपन्न हुए। इस दौरान चुनाव आयोग पर कई तीखे आरोप लगे:
  • आदर्श आचार संहिता (MCC) का कथित पक्षपातपूर्ण क्रियान्वयन: विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि शीर्ष राजनीतिक नेताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ भाषणों और आचार संहिता के उल्लंघनों पर चुनाव आयोग ने त्वरित और सख्त कार्रवाई नहीं की।
  • वोटर टर्नआउट डेटा जारी करने में देरी: मतदान के चरणों के बाद वास्तविक मतदान प्रतिशत के अंतिम आंकड़े जारी करने में लगे समय को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक याचिकाएं पहुंचीं, जहां चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए।
  • ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) की बहस: चुनाव आयोग द्वारा 100% वीवीपीएटी पर्चियों के मिलान से इनकार और अदालती प्रक्रिया के दौरान ज्ञानेश कुमार सहित पूरे आयोग को नागरिक समाज के सवालों का सामना करना पड़ा।

विवादों पर बचाव और प्रशासनिक पक्ष

विपक्षी आरोपों के विपरीत, प्रशासनिक दृष्टिकोण और सरकार का पक्ष बिल्कुल अलग रहा है:
  • अनुच्छेद 370 का शांतिपूर्ण क्रियान्वयन: ज्ञानेश कुमार के समर्थकों का कहना है कि अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था और पुनर्गठन के दौरान कोई बड़ा जानमाल का नुकसान नहीं हुआ, जो उनके प्रशासनिक नियंत्रण और कार्यकुशलता का प्रमाण है।
  • पारदर्शी चुनाव संचालन: चुनाव आयोग ने 2024 के लोकसभा चुनावों को दुनिया का सबसे बड़ा और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक अभ्यास बताया, जिसमें 64 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने मतदान किया और हिंसा की घटनाएं ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम रहीं।
  • नियमों के तहत नियुक्ति: केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा विधिवत पारित कानून और तय प्रक्रिया के अनुसार की गई थी, जिसमें सभी संवैधानिक नियमों का पालन हुआ।

एक नजर में: प्रमुख मुद्दे और विवाद

समयावधि / पद प्रमुख कार्य / जिम्मेदारी प्रमुख आरोप / विवाद
2019-2021 (गृह मंत्रालय) अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण व जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विपक्षी दलों द्वारा घाटी में इंटरनेट व नागरिक प्रतिबंधों के संचालन पर सवाल
2022-2024 (सहकारिता मंत्रालय) नया मंत्रालय गठन, सहारा रिफंड पोर्टल लॉन्च रिफंड पोर्टल के धीमे क्रियान्वयन के आरोप; सत्तारूढ़ दल से प्रशासनिक नजदीकी के आरोप
मार्च 2024 (चुनाव आयोग) चुनाव आयुक्त पद पर नियुक्ति चयन प्रक्रिया में विपक्ष को पर्याप्त समय न मिलने और सीजेआई को बाहर रखने का कानूनी विरोध
2024-2026 (ECI कार्यकाल) आम चुनाव 2024 व राज्य विधानसभा चुनाव प्रबंधन आचार संहिता उल्लंघन पर ढिलाई, वोटर डेटा में देरी और आयोग की तटस्थता पर राजनीतिक सवाल

संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और भविष्य की राह

ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर यह दर्शाता है कि जब कोई नौकरशाह अत्यधिक संवेदनशील और राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत फैसलों के केंद्र में होता है, तो विवाद और आरोप अपरिहार्य हो जाते हैं।
चाहे वह अनुच्छेद 370 का ऐतिहासिक फैसला हो या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव कराने की जिम्मेदारी—ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोप मूल रूप से इस बात के इर्द-गिर्द घूमते हैं कि क्या कार्यपालिका के वरिष्ठ चेहरे संवैधानिक संस्थाओं में जाने के बाद पूरी स्वतंत्रता से कार्य कर पाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर जनता का अटूट भरोसा सबसे अहम है, और आने वाले समय में विधानसभा चुनावों के पारदर्शी संचालन के जरिए ही आयोग इन सभी राजनीतिक आरोपों का ठोस उत्तर दे सकता है।
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