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जंतर-मंतर हिंसा मामला: स्वतंत्र भारद्वाज के बयानों से भड़का आक्रोश, कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक संरक्षण पर उठे तीखे सवाल

जंतर-मंतर हिंसा मामला
जंतर-मंतर हिंसा मामला

जंतर-मंतर पर छात्र और युवा संगठन के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसक झड़प और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर.

स्वतंत्र भारद्वाज के हालिया बयानों ने राजधानी के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। एक हालिया पॉडकास्ट में मारपीट को खुले तौर पर स्वीकार करने और शीर्ष राजनीतिक हस्तियों के नाम पर कानूनी कार्रवाई से बचने के दावों के बाद पीड़ित पक्ष, छात्र संगठन और विपक्षी दल दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
प्रदर्शन, सिर पर 60 टांके और धाराओं पर रार
यह पूरा विवाद 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान शुरू हुआ था। प्रदर्शन के दौरान हुई धक्का-मुक्की और मारपीट में एक नाबालिग छात्रा के पिता संजय के सिर पर लाठियों से गंभीर वार किए गए, जिसके चलते उन्हें अस्पताल में करीब 60 टांके लगाने पड़े।
घटना के बाद पीड़ित पक्ष और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रतिनिधियों ने दिल्ली पुलिस को दी गई शिकायत में हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC / धारा 109 BNS), खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने (धारा 326 IPC) और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। हालांकि, शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने दबाव में आकर इन गैर-जमानती और सख्त धाराओं को शामिल नहीं किया, जिससे मुख्य आरोपी को थाने के स्तर से ही राहत मिल गई।
पॉडकास्ट में दावों ने बढ़ाई मुश्किलें
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब ‘द कैजुअल टॉक’ पॉडकास्ट की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई। वीडियो में स्वतंत्र भारद्वाज यह कहते हुए सुने गए कि घटना में जानलेवा हमला हुआ था और मामला सीधे धारा 307 का बनता था। इसके साथ ही उन्होंने राजनीतिक रसूख का हवाला देते हुए दावा किया कि वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप और फोन कॉल की वजह से उन्हें जेल नहीं जाना पड़ा।
बातचीत के दौरान भाजपा नेता कपिल मिश्रा से लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और शीर्ष नेतृत्व तक का संदर्भ देकर खुद को संरक्षण प्राप्त होने की बात कही गई। इन बयानों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश फैल गया और इसे सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाला कृत्य करार दिया गया।
पुलिस की कार्यप्रणाली और दोहरे मापदंड पर सवाल
इस विवाद ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है:
* दोहरे कानूनी मानक: सामान्य लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों और एक्टिविस्टों पर तुरंत सख्त और गैर-जमानती धाराएं थोप दी जाती हैं, जबकि गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने वाले रसूखदारों को पुलिसिया नरमी का फायदा मिलता है।
* एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन: कानूनी जानकारों का तर्क है कि सार्वजनिक मंच पर अपराध और राजनीतिक दबाव का जिक्र करना एक तरह का न्यायेतर इकबालिया बयान (Extra-Judicial Confession) है, जिसे पुलिस को केस डायरी में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में शामिल करना चाहिए।
अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी
दिल्ली पुलिस की ढिलाई के खिलाफ अब पीड़ित पक्ष और उनकी लीगल टीम मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में अर्जी दाखिल करने जा रही है। याचिका के जरिए मांग की जा रही है कि अदालत स्वयं संज्ञान लेते हुए पुलिस को एफआईआर में धारा 307 और एससी/एसटी एक्ट जोड़ने का आदेश दे, साथ ही सोशल मीडिया और पॉडकास्ट के फुटेज को फॉरेंसिक जांच के दायरे में लाकर आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करे।
सार्वजनिक रूप से कानून को धता बताने और राजनीतिक संरक्षण के दावों के बीच अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत और पुलिस प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं।

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